एकता दूर करेगी साम्प्रदायिकता
साम्प्रदायिकता को सरल शब्दों में समझा जाए तो :—सांप्रदायिकता वह है जिसमें लोग अपने धर्म व जाति प्रभाव से अपनी इच्छाओं व मांगों की पूर्ति करते हैं। इसके अलावा सांप्रदायिकता का अर्थ “दूसरे समुदाय के प्रति धार्मिक भाषा अथवा सांस्कृतिक आधार पर असहिष्णुता की भावना रखना तथा धार्मिक सांस्कृतिक भिन्नता के आधार पर अपने समुदाय के लिए राजनीतिक अधिकार, अधिक सत्ता, प्रतिष्ठा की मांगे रखना और अपने हितों को राष्ट्रीय हितो से ऊपर रखना है। ”
सांप्रदायिकता लोगों को एक - दूसरे का विरोधी बनाती है जिसमें अंधविश्वास, असहिष्णुता दूसरे धर्मों के प्रति दुष्प्रचार व दूसरों के विरुद्ध हिंसा और विरोधाभासी रुप सामने आता है ।
आज के समय में सांप्रदायिकता केवल राजनीति का हथियार बनी हुई है जिसमें देखा ही जा सकता है कि लोग स्वयं किसी भी विषय के बारे में न जानना चाहते हैं न ही सोचना चाहते हैं उन्हें केवल ऐसे लोगों की कही- सुनी बातों पर विश्वास होता है जो उन्ही लोगों के प्रति अथवा समाज में रहने वाले विभिन्न धर्मों, जातियों के लोगों में भिन्नता व भेदभाव की भावना उत्पन्न करते हैं ।
सांप्रदायिकता लोगों को एक - दूसरे का विरोधी बनाती है जिसमें अंधविश्वास, असहिष्णुता दूसरे धर्मों के प्रति दुष्प्रचार व दूसरों के विरुद्ध हिंसा और विरोधाभासी रुप सामने आता है ।
आज के समय में सांप्रदायिकता केवल राजनीति का हथियार बनी हुई है जिसमें देखा ही जा सकता है कि लोग स्वयं किसी भी विषय के बारे में न जानना चाहते हैं न ही सोचना चाहते हैं उन्हें केवल ऐसे लोगों की कही- सुनी बातों पर विश्वास होता है जो उन्ही लोगों के प्रति अथवा समाज में रहने वाले विभिन्न धर्मों, जातियों के लोगों में भिन्नता व भेदभाव की भावना उत्पन्न करते हैं ।
भारत की राजनीति में सांप्रदायिकता एक बहुत बड़ा हथियार है जिसमें साधारणत: आम जनता को ही फसाया जाता है। सांप्रदायिकता के नाम पर ही लोग एक- दूसरे के प्रति कटुभावना , कटुविचार रखना शुरु कर देते हैं। इसका फायदा राजनीति में उठाया जाता है । हम सभी को पता ही है कि सांप्रदायिकता के नाम पर ही देश में लकीर खींची थी जहां एक तरफ पाकिस्तान व दूसरी तरफ हिंदुस्तान बन गया सांप्रदायिकता केवल दो देशों के लिए ही नहीं बल्कि हर ऐसे मुद्दे को भड़काती है जिसमें दो या दो से अधिक धर्म के लोगों का आमना - सामना हो उदाहरण के तौर पर हम बाबरी मस्जिद व राम मंदिर का मामला देख सकतें हैं जिसमें दो धर्मों के बीच केवल स्थान के नाम पर सांप्रदायिकता ने अपना बोलबाला किया था जिसमें सांप्रदायिकता के चलते बाबरी मस्जिद राम मंदिर प्रकरण ने भारतीय समाज और राजनीति को विभाजित कर दिया कुछ राजनीतिक दलों ने इस विवाद का राजनीतिकरण कर दिया। इसका प्रभाव इस तरह लोगों पर पड़ा जिसमें कुछ कट्टरपंथी ताकतों ने विवादित ढाँचे को ही ध्वस्त कर दिया जिससे देश में सांप्रदायिक दंगे भड़क गए। लेकिन अब वह किसी हद तक राम मंदिर के मामले को कठिन प्रयासों के बीच से संभाला गया है जिसमें भी कभी- न- कभी विवाद बना रहता है।
अब देश में सीएए और एनआरसी को लेकर विवाद जारी है लोगों को गलतफहमी की राह पर भेजा जा रहा है जिसमें राजनैतिक पार्टियां अपने हाथ धो रही हैं जिसे रोकने के प्रयास हमारे द्वारा ही किए जा सकते हैं क्योंकि हम किसी को जाने बिना कोई भी कदम उठाएं उससे हमारा ही नुकसान होगा किंतु हम किसी भी कार्य को सोच- समझकर, जानकर करें तो देश में काफी हद तक सांप्रदायिकता की भावनाएं भी उत्पन्न नहीं हो सकेगीं।
एकता की परिभाषा में–“ हम सभी एक हैं, हम एक ही मिट्टी से बने हैं , हम सभी की जाति, धर्म एक हैं, हम सभी का नाम भी एक है वह है भारतीय।”
एकता की परिभाषा में–“ हम सभी एक हैं, हम एक ही मिट्टी से बने हैं , हम सभी की जाति, धर्म एक हैं, हम सभी का नाम भी एक है वह है भारतीय।”
भारत की नींव में भी एकता है जिसमें हम सभी को एक होकर रहना चाहिये चूँकि एक रिश्ते का निर्माण केवल दो लोगों से नहीं होता वैसे ही समाज का निर्माण भी केवल धर्म - जाति के नाम पर नहीं किया जाना चाहिये। जिस प्रकार एक संबंध स्थापित करने के लिए दो परिवारों को जुड़ना पड़ता है उसी प्रकार एक समाज, एक देश का निर्माण करने के लिए हम सभी का एक होना आवश्यक है। हमारे द्वारा साक्षर बनकर देखा जाए तो कभी भी धर्म या जाति से लोगों की पहचान नहीं की जा सकती क्योंकि हमारी पहचान हम स्वयं ही बनाते हैं अपने साक्षर विभाग व्यवहार से अपने जिम्मेदार नागरिक होने से जिसके द्वारा एकता स्थापित की जाती है जैसा कि डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने भी कहा है —
“पुस्तक पुस्तकें वह साधन हैं जिनके माध्यम से हम विभिन्न संस्कृतियों के बीच पुल का निर्माण कर सकते हैं।”
हम सभी का साक्षर होना अति आवश्यक है जिसके बाद हम धर्म, जाति के मसलों में न फंसकर ऐसी सोच का निर्माण करें जो हमें सदैव आगे बढ़ने अथवा अच्छा काम करने की प्रेरणा दे।
इसके अलावा हमें ऐसा व्यक्तित्व बनाने की जरूरत है जिससे लोगों को प्रेरणा मिले , यही हमारी भारतीय होने की पहचान बने , जोकि सत्य का स्वरूप हो।
धर्म देता है ज्ञान
“पुस्तक पुस्तकें वह साधन हैं जिनके माध्यम से हम विभिन्न संस्कृतियों के बीच पुल का निर्माण कर सकते हैं।”
हम सभी का साक्षर होना अति आवश्यक है जिसके बाद हम धर्म, जाति के मसलों में न फंसकर ऐसी सोच का निर्माण करें जो हमें सदैव आगे बढ़ने अथवा अच्छा काम करने की प्रेरणा दे।
इसके अलावा हमें ऐसा व्यक्तित्व बनाने की जरूरत है जिससे लोगों को प्रेरणा मिले , यही हमारी भारतीय होने की पहचान बने , जोकि सत्य का स्वरूप हो।
धर्म देता है ज्ञान
कर्म देता है पहचान,
एक होकर मिली एकता
जो दूर करेगी साम्प्रदायिकता
लेखक :- रिया तोमर
Comments
Post a Comment